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इंजीनियरिंग छोड़ उगा रहा है लेमन ग्रास

अभिषेक समदर्शी
गुमला के घाघरा प्रखंड में स्थित है हापामुनी गांव। यह इलाका आदिवासी बहुल है। नेतरहाट की पहाडिय़ां सामने नजर आती हंै।  इसके ठीक तराई पर दूर तक लहलहाते उंचे उंचे घास के मैदान को देख मन कोतूहल से भर उठा।  सोचा बरसात अच्छी हुई होगी इसलिए ऐसी घास उग आयी है।  लेकिन जब पास गया तो लेमन सुगंध पूरे वातावराण में फैल रही थी। पूछने पर पता चला कि कोई साधारण घासनहीं बल्कि लेमन ग्रास है। पास ही खड़े एक युवक ने हमारी उत्सुकता और बढ़ा दी और मुस्कुराकर कहा कि मैंने ही उगाया है लेमन ग्रास। उसके साथ खड़े दूसरे युवक ने धीरे से कहा कि ये नीतीश सिंह हैं, एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर। इस जानकारी के बाद कोई भी आश्चर्यचकित हो सकता है, लेकिन जब नीतीश से रूबरू हुआ तो उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका।  उनसे हुई मुलाकात और नेतरहाट की पहाडिय़ों की तराई को और खूबसूरत बनाने की कवायद बहुत यादगार रही।


नीतीश सिंह मूलत: रहनेवाले हैं राजस्थान के, लेकिन गुमला के नक्सल प्रभावित गांव हापामुनी को अपनी कर्मभूमि बनाया। तमाम परेशानियों से जूझते हुए उन्होंने ना सिर्फ पारंपरिक खेती की परिभाषा बदली, बल्कि सैकड़ो लोगों के लिए प्ररेणा स्त्रोत बने। आज इनका उगाया हुआ लेमन ग्रास विभिन्न रूपों में विदेशों की पहली पसंद बन गई है। इनका उगाया लेनम ग्रास साउदी अरब, सिंगापुर, फ्रांस समेत भारत के विभिन्न स्थानों में सप्लाई की जा रही है।
बेबीकॉर्न के बाद लेमन ग्रास को चुना
नीतीश आज से दो साल पूर्व तक बड़े पैमाने में बेबीकॉर्न का उत्पादन करते थे। इनका उगाया बेबीकॉर्न होटल हयात इंटरनेशनल में बड़े पैमाने पर सप्लाई किया गया। लेकिन मजदूरों की कमी की वजह से उन्होंने बेबीकॉर्न की जगह लेमन ग्रास के खेती करना शुरू किया। आज करीब 100 एकड़ में उगाए गए लेमन ग्रास की खूबसूरती देखते बनती है। लेमन ग्रास को तैयार होने में करीब एक साल का समय लगता है। बरसात खत्म होतेे ही इसकी कटाई शुरू होगी।
कौन हैं नीतीश
मूलत: राजस्थान के रहनेवाले नीतीश ने बीआईटी से सॉफ्टवेयर इंजीनिरिंग की है। लेकिन इंजीनियरिंग में उनका मन नहीं लगा। उन्होंने नौकरी छोड़, खेती को चुना। इसके बाद वे पारंपरिक खेती ना कर बाजार की जरूरत के अनुसार खेती करनेे का मन बनाया। देश-विदेश घूमकर पहले सबसे ज्यादा मांग वाली वस्तुओं की जानकारी जुटाई और लग गए खेती में। करीब तीन साल के अथक प्रयास के बाद वे सफलता की ओर कदम बढ़ाने लगे हैं। नीतीश कहते ैेहंै ंकि सफलता को हासिल करने के लिए बहुत पसीना बहाना पड़ता है।
सबों ने रोका लेकिन मैं नहीं रूका
नीतीश द्वारा इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ किसान बनता देख कई लोगों उन्हें मुझे रोका। लेकिन उन्होंने तय कर लिया था कि कुछ अलग करना है। एक नई सोच और मजबूत इरादों के साथ उन्होंने खेती शुरू की और आज वे एक सफल किसान हैं।
प्लांट से लेमन ग्रास तेल भी निकालते हैं
 लेमन ग्रास को कटिंग कर वे देश और विदेशों में बेचते तो हैं ही। साथ ही उसका तेल भी निकालते हैं। इसके लिए उन्होंने अपने अभिभावकों की मदद से एक प्लांट भी तैयार किया है। जहां तेल निकालने का काम होता है। इसकी सप्लाई फ्रांस समेत अन्य देशों में की जाती है।
बंजर पड़े भूमि का किया उपयोग
नितीश बताते हैं, कि झारखंड के किसान सबसे अधिक ध्यान धान की खेती में देते हैं। कुछ को छोड़कर अन्य सिर्फ धान की फसल पर निर्भर हैं। इसलिए हमने उस जमीन को चुना जिसमें खेती नहीं होती थी। किसानों को समझा कर उनकी जमीन लीज पर ली और लेमन ग्रास की खेती शुरू की। आज बंजर पड़ी उस भूमि पर लेमन ग्रास की हरियाली देखते बनती है। किसानों का भी पारंपरिक खेती से मोहभंग हो रहा है, लेकिन इसमें समय लगेगा। 
बहुत कम जगह की जाती है लेमन ग्रास की खेती
कोचिन या मालाबार घास की  इस प्रजाति का उद्भव श्रीलंका और दक्षिणी भारत से माना जाता है। लेकिन अब लेमन ग्रास की खेती शीतोष्ण क्षेत्र जैसे अमेरिका और एशिया में भी किया जाता है। भारत में इसकी खेती केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, उतराखंड और असम में होता है। इसकी खेती के लिए गर्म और उमस जैसे वातावरण उपयुक्त माने जाते हैं। जहां जरूरत भर सूर्य की रोशनी और 250 से 300 सेंमी की बारिश और तापमान 20 से 36 डिग्री तक का हो।

इसका उपयोग
लेमन ग्रास का उपयोग बड़े पैमाने पर हर्बल चाय बनाने, कॉस्मेटिक और तेल निकालने में किया जाता है। बड़े-बड़े ेहोटल में इसके कोमल तने को भोजन के साथ परोसा भी जाता है। इसके तेल का उपयोग दर्द को ठीक करने में भी किया जाता है। इसकी कीमत 100 रुपए लीटर तक है।

मवेशी घास को नहीं बनाते निवाला
लेमन ग्रास की खासियत है कि इसे मवेशी नहीं चरते। जिससे इसकी रखवाली नहीं करनी पड़ती है।  इसके बीज को रोपने के बाद करीब एक साल में लेमन ग्रास तैयार हो जाता है और पांच साल तक इसका लाभ उठाया जा सकता है।

भूस्खलन रोकने में कारगर लेमन ग्रास
पहाड़ की घाटियों और गर्म इलाकों में बहुत आसानी के साथ विकसित होने वाली सिमडोफ्लोरिशओसी, लैमन ग्रास डायबिटीज और ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों में कारगर दवा का कार्य करती है। भूस्खलन रोकने में भी लेमन ग्रास अत्यधिक उपयोगी साबित हुई है। इसी कारण वन विभाग ने इसके प्रसारण की पहल शुरू की है। लेमन ग्रास को पूर्व से ही परंपरागत वैद्यों द्वारा दवाओं के निर्माण में उपयोग किया जाता रहा है। आम तौर पर अन्य घासों की तरह ही लेमन घास दिखाई पड़ती है। किंतु औषधीय तथा तमाम अन्य उपयोगों के चलते इसका काफी महत्व है। लेमन घास के अर्क से मधुमेह और रक्तचाप की दवाइयां बनाई जाती हैं। एलर्जी के उपचार में यह कारगर साबित होता है।
लेमन घास की पत्तियों से औषधीय चाय बनाई जाती है। इसके अलावा दांत दर्द, सिर दर्द, बुखार में भी इसका उपयोग होता है। औषधीय उपयोग के साथ ही लेमन ग्रास भूस्खलन रोकने में भी मददगार साबित होती है। इसकी जड़ें गहरी और मजबूत होने के कारण भूमि के ऊपरी कटाव तथा भूस्खलन को रोकने में सहायता मिलती है। लेमन ग्रास के आसपास मच्छर पैदा नहीं होते। आम तौर पर गर्म और घाटी क्षेत्रों में लेमन ग्रास का उत्पादन अधिक मात्रा में होता है।

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