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18 वर्षों बाद भी प्रदेश में नक्श्ल की समस्या बरकरार

रांची : झारखण्ड सरकार  भले आज  झारखंड का 18 वां स्थापना दिवस मना रही  है .लेकिन झारखण्ड की सबसे बडी समस्या नक्सल वाद अबतक समाप्त नहीं हुई है.जबकि हर साल स्थापना दिवस कार्यक्रम समारोह में प्रदेश को  नक्सल मुक्त करने की बात सरकार करती आई है. इससे पहले के तीन वर्षों में भी यह समारोह बड़ी धूमधाम से मनाया गया था और उसकी पूर्वसंध्या पर कई घोषणाएं की गई  थीं. बड़ी-बड़ी घोषणाएं तो की गई , लेकिन उनका हश्र क्या हुआ यह शायद सरकार को भी ठीक-ठीक पता नहीं. कुछ घोषणाएं तो ऐसी थीं जिनके पूरा होने की उम्मीद निकट भविष्य में नहीं.14 नवंबर 2015 को राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने घोषणा की थी कि साल 2019 तक राजधानी रांची में दिल्ली जैसी सुविधाएं मिलने लगेंगी. अब दिल्ली जैसी सुविधा से उनका तात्पर्य क्या था, यह तो हमें नहीं मालूम, पर राजधानी में दिल्ली जैसी कोई भी सुविधा राजधानीवासियों को महसूस नहीं होती. एक और घोषणा पर गौर करें तो उन्होंने कहा था कि 10 वर्षों में झारखंड से कुपोषण मिटा दिया जायेगा और इसमें मोबाइल और आइटी का भी सहयोग लिया जायेगा. कुपोषण की हालत राज्य में जस की तस ही प्रतीत हो रही है. इसके अलावा उन्होंने कहा था कि अगले साल के बजट में 60 फीसदी राशि गरीबों और गांव के विकास के लिए रखी जायेगी. गांव और गरीबों की हालत में कोई खास फर्क नजर नहीं आता. सीएम ने घोषणा की थी कि चेक डैम का पैसा गांव के लोगों को खर्च करने के लिए दिया जायेगा. यदि ऐसा होता को चेक डैम योजना में गड़बड़ी की खबरें नहीं आतीं.सबसे महत्वपूर्ण घोषणा उन्होंने यह की कि 2017 तक राज्य के सभी गांवों में बिजली पहुंचा दी जायेगी. साल 2018 खत्म होने को है अब भी हजारों गांव अंधेरे में हैं. इसके अलावा उन्होंने घोषणा की थी कि नगर निगम को 200 पुलिसकर्मी दिये जायेंगे जो शहर को स्वच्छ रखने में उसे सहयोग करेंगे. ऐसा नहीं हुआ है. राजधानी की सिवरेज-ड्रेनेज योजना का शिलान्यास करते हुए उन्होंने घोषणा की थी कि यह काम दो साल में पूरा हो जायेगा. तीन साल से अधिक समय बीत चुका है काम पूरा नहीं हुआ है. साथ ही जिन इलाकों लाइन डाला गया है उन इलाके के गली-मुहल्लों की सड़कों की स्थिति इतनी दयनीय हो गयी है क पैदल चलना भी दूभर हो गया है.



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