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झारखण्ड में थर्ड फ्रंट के आसार,आजसू-झाविमो बन सकती है सबसे बड़ी ताकत !

रांची : झारखण्ड में कुछ भी संभव है,जी हाँ कल तक भाजपा से कदम-कदम ताल करने वाली पार्टी आजसू की राह अब अलग हो गई है.इसका मुख्य कारण वैचारिक मतभेद बताया जा रहा है. साथ ही सीटों के तालमेल नहीं होना भी एक कारण है. दरअसल 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में पूरे देश में भाजपा को मिली प्रचंड बहुमत के बाद भाजपा का हौसला बुलंद हो गया. वह अपने सहयोगियों को कम भाव देने लगी.इससे सहयोगी दलों में भाजपा के प्रति असंतोष की भावना होने लगी.लेकिन इसकी परवाह भाजपा के नेताओं को नहीं थी. चुनाव से पहले ही भाजपा अपने सहयोगी दल के बगैर चुनावी मैदान में उतरने का मन बना चुकी थी.यही कारण है कि अपने पुराने सहयोगी दल आजसू को भाजपा के शीर्ष नेता आजसू को पहले 5, 8 और बाद में 10 सीटें देने पर अड़े रहे  .ताकि आजसू खुद ही अपनी राह अलग कर ले.जेडीयू को तो पहले ही लाल झंडी दिखने का कम किया.सबसे आखिरी में लोजपा को भी नहीं छोड़ा,उसे भी बाय-बाय कर दिया.
इसबार झारखण्ड विधानसभा चुनाव में कमोवेश 2019 वाली स्थिति हो गई है.उस समय भाजपा-जेडीयू और आजसू एक साथ थी. उधर कांग्रेस,जेएमएम,झाविमो,राजद व अन्य दल अलग-अलग लड़ी थी.
बाद में चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा ने झामुमो के साथ सरकार बनाने का काम किया था.जिसमे मुख्यमंत्री शिबू सोरेन बने थे.
वर्तमान में भी वही परिस्थिति उत्पन्न हो रही है.चुनाव परिणाम में यदि भाजपा बहुमत से पीछे रही तो वह नये साथी की तलाश करेगी. वैसी स्थिति में झामुमो से भी हाथ मिलाने में परहेज नहीं करेगी.बाद में मीडिया में भाजपा के नेताओं का बयान आएगा झामुमो भाजपा का पुराना साथी रहा है.अब कॉमन मिनिमम एजेंडा के तहत सरकार चलेगी.

इसके अलावा चुनाव परिणाम में आजसू और झाविमो सबसे बड़ी ताकत उभर सकती है.इसमें थोड़ी बहुत बहुमत कम होने पर कांग्रेस और अन्य दल के विधयाकों को तोड़ कर सरकार बना सकती है. यानि झारखण्ड में थर्ड फ्रंट बनता दिख रहा है. यह चुनाव परिणाम के बाद ही स्पष्ठ हो जाएगा.

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